कुछ लोगों को पर्याप्त नींद के बाद भी सुबह सुस्ती महसूस होती है और दिन में आँख लगने लगती है। अगर साथ में खर्राटे भी आते हों, तो सोते समय साँस लेने में कोई रुकावट तो नहीं है, इस पर ध्यान देना चाहिए।
कई लोग तेज़ खर्राटों को गहरी नींद की निशानी मान लेते हैं। हर खर्राटा बीमारी का संकेत नहीं होता, लेकिन खर्राटों के बीच साँस रुकना या हाँफकर उठना स्लीप एपनिया का संकेत हो सकता है। ऐसे बदलावों को केवल थकान समझकर टालना ठीक नहीं है।
इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि खर्राटे और स्लीप एपनिया में क्या संबंध है, किन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए और जाँच व इलाज से कैसे मदद मिल सकती है।
खर्राटे और स्लीप एपनिया में संबंध
नींद में गले की मांसपेशियाँ आराम की स्थिति में होती हैं। इससे कुछ लोगों में हवा के लिए जगह कम हो जाती है। इस सँकरे रास्ते से हवा गुज़रने पर आसपास के नरम हिस्से काँपते हैं और खर्राटों की आवाज़ बनती है।
स्लीप एपनिया में साँस का बहाव बार-बार बाधित होता है। कभी साँस कुछ देर के लिए थम जाती है, तो कभी हवा बहुत कम पहुँचती है।
इसके दो प्रमुख प्रकार हैं:
- ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया: गले की मांसपेशियाँ ढीली पड़ने से हवा का रास्ता बार-बार बंद होता है। ये सबसे आम प्रकार है।
- सेंट्रल स्लीप एपनिया: दिमाग़ से साँस लेने वाली मांसपेशियों तक सही संकेत नहीं पहुँचते।
स्लीप एपनिया में हर व्यक्ति को खर्राटे आएँ, ऐसा ज़रूरी नहीं है।
खर्राटे आने के कारण
सर्दी या एलर्जी से नाक बंद होने, पीठ के बल सोने और शराब पीने से खर्राटे बढ़ सकते हैं। कुछ लोगों में गले या जबड़े की बनावट के कारण हवा का रास्ता सँकरा होता है।
इन बातों से स्लीप एपनिया होने की आशंका बढ़ सकती है:
- अधिक वज़न: गर्दन के आसपास जमा चर्बी गले में हवा के लिए जगह कम कर सकती है। इससे सोते समय साँस लेने में रुकावट हो सकती है।
- बड़े टॉन्सिल: इनका आकार बड़ा होने से हवा को गले से गुज़रने के लिए कम जगह मिलती है।
- पारिवारिक इतिहास: परिवार में स्लीप एपनिया होना जोखिम बढ़ा सकता है।
- शराब और धूम्रपान: शराब गले की मांसपेशियों को अधिक ढीला करती है। धूम्रपान से हवा के रास्ते में सूजन हो सकती है।
वज़न सामान्य हो, तब भी गले की बनावट या दूसरे कारणों से स्लीप एपनिया हो सकता है।
स्लीप एपनिया के लक्षण
सोने वाले व्यक्ति को साँस रुकने का पता अक्सर नहीं चलता। साथ सोने वाला व्यक्ति बता सकता है कि आप तेज़ खर्राटे लेते हैं या बीच-बीच में आपकी साँस रुकती है। साँस रुकने के बाद आप अचानक हाँफने भी लग सकते हैं।
आपको ख़ुद भी कुछ परेशानियाँ महसूस हो सकती हैं, जैसे:
- रात में दम घुटने जैसा लगना या हाँफकर उठना।
- बार-बार नींद खुलना या पेशाब के लिए उठना।
- सुबह मुँह सूखना या सिरदर्द होना।
- पर्याप्त समय सोने के बाद भी तरोताज़ा महसूस ना होना।
- दिन में बहुत नींद आना, काम करते हुए ऊँघना या ध्यान लगाने में परेशानी।
नींद की कमी और कुछ दवाओं से भी दिन में नींद आ सकती है। केवल लक्षणों से बीमारी की पुष्टि नहीं होती।
स्लीप एपनिया से शरीर पर असर
सोते समय साँस रुकना शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलने में बाधा डाल सकता है। ऐसी रुकावटों के दौरान कुछ पल के लिए नींद खुल सकती है, लेकिन सुबह ये याद नहीं रहता। इस तरह नींद में बार-बार खलल पड़ने से रात भर सोने के बावजूद थकान महसूस हो सकती है।
इलाज के बिना स्लीप एपनिया इन समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है:
- हाई ब्लड प्रेशर या पहले से बढ़े ब्लड प्रेशर को क़ाबू करने में कठिनाई।
- दिल की धड़कन में गड़बड़ी, हार्ट अटैक और स्ट्रोक।
- याददाश्त, ध्यान और फ़ैसले लेने में परेशानी।
- दिन में नींद आने से गाड़ी चलाते समय या काम पर दुर्घटना।
हर मरीज़ को ये समस्याएँ नहीं होतीं।
समस्या की पहचान और स्लीप स्टडी
स्लीप एपनिया का पता लगाने के लिए डॉक्टर पहले आपकी नींद और लक्षणों के बारे में पूछते हैं। वे जानना चाहेंगे कि खर्राटे कब से आ रहे हैं और दिन में कितनी नींद आती है। साथ सोने वाला व्यक्ति बता सकता है कि नींद में आपकी साँस रुकती है या आप हाँफकर उठते हैं।
स्लीप एपनिया का शक होने पर स्लीप स्टडी की सलाह दी जा सकती है। इस जाँच में इन बातों पर ध्यान दिया जाता है:
- साँस की निगरानी: नींद में साँस कब थमती है या हवा का बहाव कितना कम होता है, इसकी रिकॉर्डिंग की जाती है। इससे रुकावटों की संख्या पता चलती है।
- ऑक्सीजन और दिल की धड़कन: साँस में रुकावट के दौरान ख़ून में ऑक्सीजन और धड़कन में होने वाले बदलाव दर्ज किए जाते हैं।
- नींद और शरीर की हलचल: अस्पताल में की जाने वाली विस्तृत जाँच में नींद के चरण भी देखे जाते हैं।
चुनिंदा वयस्कों की जाँच घर पर उपकरण से भी हो सकती है। उपयुक्त जाँच डॉक्टर चुनते हैं। रिपोर्ट से बीमारी का प्रकार और गंभीरता समझी जाती है।
स्लीप एपनिया का इलाज
इलाज बीमारी के प्रकार, गंभीरता और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के अनुसार तय होता है।
इसके प्रमुख विकल्प हैं:
- सीपैप थेरेपी: मास्क के ज़रिए लगातार दबाव वाली हवा दी जाती है। इससे सोते समय हवा का रास्ता खुला रहता है। ख़ासकर मध्यम या गंभीर ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया में इससे मदद मिल सकती है।
- मुँह में लगाया जाने वाला उपकरण: निचले जबड़े को आगे रखकर हवा का रास्ता खुला रखने में मदद करता है। चुनिंदा मरीज़ों में या सीपैप इस्तेमाल करने में कठिनाई होने पर इसे चुना जा सकता है। दाँतों के विशेषज्ञ इसे मरीज़ के अनुसार तैयार करते हैं।
- आदतों में सुधार: अधिक वज़न हो, तो उसे घटाने से कुछ मरीज़ों को फ़ायदा मिल सकता है। करवट पर सोना भी मददगार हो सकता है। विशेषज्ञ इन उपायों को ज़रूरी इलाज के साथ अपनाने की सलाह दे सकते हैं।
- सर्जरी: गले की बनावट या बड़े टॉन्सिल हवा का रास्ता रोक रहे हों, तो कुछ मरीज़ों में ऑपरेशन मदद कर सकता है। इसे चुनने से पहले विशेषज्ञ देखते हैं कि दूसरे इलाज कितने उपयुक्त हैं और ऑपरेशन से क्या फ़ायदे व जोखिम हो सकते हैं।
मास्क ठीक से ना बैठे या मुँह सूखे, तो विशेषज्ञ को बताएँ। फ़ॉलो-अप में इन दिक़्क़तों और इलाज के असर की समीक्षा होती है।
रोज़मर्रा की देखभाल और सलाह लेने का समय
इलाज के साथ इन आदतों पर ध्यान दें:
- सोने और उठने का समय नियमित रखें।
- अधिक वज़न हो, तो भोजन और कसरत की योजना पर सलाह लें।
- शराब और धूम्रपान से बचें।
- नींद लाने वाली दवा लेने से पहले डॉक्टर की सलाह लें।
- नींद आ रही हो, तो गाड़ी या मशीन ना चलाएँ।
खर्राटों के बीच साँस थमने, रात में हाँफकर जागने या दिन में बहुत नींद आने पर जाँच कराएँ। अगर आप नोएडा में स्लीप एपनिया का इलाज तलाश रहे हैं, तो नींद की समस्याओं का इलाज करने वाले विशेषज्ञ से सलाह लें। वे लक्षणों और जाँच के आधार पर उचित इलाज सुझा सकते हैं।
जागते समय गंभीर साँस की परेशानी, सीने में तेज़ दर्द या बेहोशी हो, तो तुरंत नज़दीकी इमरजेंसी विभाग जाएँ। इन्हें केवल स्लीप एपनिया का असर मानकर इंतज़ार ना करें।
निष्कर्ष
खर्राटे और स्लीप एपनिया का संबंध समझना सही समय पर मदद लेने में उपयोगी है। खर्राटों के साथ साँस रुकने या दिन में बहुत नींद आने को नज़रअंदाज़ ना करें। उचित इलाज से नींद और रोज़मर्रा के काम करने की क्षमता में सुधार हो सकता है।
सर्वोदय हॉस्पिटल, फ़रीदाबाद, भारत में सर्वोत्तम फुफ्फुस एवं निद्रा चिकित्सा अस्पताल, के पल्मोनोलॉजी और स्लीप मेडिसिन विभाग के डॉक्टर लक्षण समझकर उचित जाँच व इलाज की योजना बनाते हैं। वे सीपैप के इस्तेमाल और नींद व वज़न से जुड़ी आदतों पर भी मार्गदर्शन देते हैं।
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