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बच्चों में सुनने की क्षमता कम होना: लक्षण, कारण और हियरिंग टेस्ट की सही उम्र

बच्चों में सुनने की क्षमता कम होना: लक्षण, कारण और हियरिंग टेस्ट की सही उम्र

कई बार बच्चा सामने देखकर बात समझ लेता है, लेकिन पीछे से बुलाने पर जवाब नहीं देता। माता-पिता को लग सकता है कि बच्चा ध्यान नहीं दे रहा या जानबूझकर बात अनसुनी कर रहा है। लेकिन ये इस बात का संकेत भी हो सकता है कि उसे कुछ आवाज़ें साफ़ सुनाई नहीं दे रही हैं।

इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि बच्चों में सुनने की क्षमता कम होने के संकेत क्या हैं, बच्चे का हियरिंग टेस्ट कब करवाना चाहिए और समस्या मिलने पर कौन-से इलाज किए जा सकते हैं।

बच्चों में सुनने की समस्या क्या है?

कान आवाज़ को संकेतों में बदलकर सुनने वाली नस के ज़रिए दिमाग़ तक पहुँचाता है। कान, नस या इस पूरी प्रक्रिया के किसी हिस्से में परेशानी होने पर बच्चा आवाज़ को ठीक से नहीं सुन पाता। समस्या एक कान या दोनों कानों में हो सकती है।

कुछ बच्चों को केवल धीमी या ऊँची आवाज़ें सुनने में परेशानी होती है, जबकि कुछ को लगभग सभी आवाज़ें कम सुनाई देती हैं। बच्चों में सुनने की समस्या की सही पुष्टि हियरिंग टेस्ट से होती है।

बच्चों में सुनने की क्षमता कम होने के संकेत

सुनने में परेशानी के संकेत बच्चे की उम्र और समस्या की गंभीरता के अनुसार अलग हो सकते हैं।

इन संकेतों पर ध्यान दें:

  • आवाज़ की दिशा में ना देखना: 6 महीने की उम्र के बाद भी बच्चा आवाज़ सुनकर उसकी दिशा में सिर नहीं घुमाता।
  • नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया ना देना: बच्चा सामने देखकर कही गई बात समझ लेता है, लेकिन पीछे से या दूसरे कमरे से नाम पुकारने पर जवाब नहीं देता।
  • कुछ आवाज़ें ही सुनना: बच्चा तेज़ आवाज़ पर प्रतिक्रिया देता है, लेकिन सामान्य बातचीत या धीमी आवाज़ें सुनने में उसे परेशानी हो सकती है।
  • बात दोहराने को कहना: बड़ा बच्चा बार-बार “क्या?” पूछता है या बात समझने के लिए सामने वाले का चेहरा देखता है।
  • टीवी या मोबाइल की आवाज़ तेज़ रखना: बच्चा टीवी या मोबाइल की आवाज़ दूसरों से अधिक रखता है या सुनने के लिए स्क्रीन के पास बैठता है।

ये बदलाव बच्चों में सुनने की समस्या के लक्षण हो सकते हैं। हालाँकि, ध्यान की समस्या, भाषा के विकास में देरी या दूसरी स्थितियों में भी ऐसे संकेत दिखाई दे सकते हैं।

बच्चों में सुनने की समस्या के सामान्य कारण

बच्चों में कान की समस्या जन्म से हो सकती है या बाद में शुरू हो सकती है।

इसके कुछ सामान्य कारण हैं:

  • जेनेटिक कारण: परिवार में किसी को सुनने की समस्या हो, तो बच्चे में भी इसका ख़तरा बढ़ सकता है। हालाँकि, कभी-कभी परिवार में पहले किसी को ये समस्या ना होने पर भी जीन में बदलाव इसका कारण बन सकता है।
  • गर्भावस्था या जन्म से जुड़ी स्थितियाँ: गर्भावस्था के दौरान कुछ संक्रमण, समय से पहले जन्म, जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी या गंभीर बीमारी सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
  • कान का संक्रमण: मिडिल ईयर में संक्रमण होने पर दर्द, सूजन या फ़्लूइड जमा हो सकता है। इससे आवाज़ कान के अंदर ठीक तरह से नहीं पहुँचती और कुछ समय के लिए कम सुनाई दे सकता है।
  • कान में मैल: बहुत अधिक मैल जमा होने पर कान की नली बंद हो सकती है। इससे आवाज़ धीमी या बंद-सी सुनाई दे सकती है।
  • बीमारी या चोट: मेनिन्जाइटिस जैसी बीमारी, सिर या कान की चोट और कान में कोई नुकीली वस्तु डालना भी सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

बच्चे की सुनने की जाँच कब करवानी चाहिए?

नवजात शिशु की पहली हियरिंग स्क्रीनिंग जन्म के बाद और 1 महीने की उम्र तक हो जानी चाहिए। अगर बच्चा स्क्रीनिंग पास नहीं करता, तो इसका अर्थ हमेशा ये नहीं होता कि उसे स्थायी समस्या है।

इन स्थितियों में बच्चे की सुनने की क्षमता की जाँच करवाएँ:

  • नवजात की हियरिंग स्क्रीनिंग ना हुई हो या उसका परिणाम स्पष्ट ना आया हो।
  • बच्चा तेज़ आवाज़, सामान्य बातचीत या अपना नाम सुनकर प्रतिक्रिया ना देता हो।
  • शिक्षक को लगे कि बच्चा कक्षा में निर्देश ठीक से नहीं सुनता।
  • गंभीर बीमारी, सिर की चोट या तेज़ आवाज़ के बाद सुनने में बदलाव आया हो।

ज़रूरत पड़ने पर किसी भी उम्र में दोबारा बच्चों की सुनने की जाँच कराई जा सकती है।

बच्चों में सुनने की क्षमता की जाँच कैसे होती है?

हियरिंग टेस्ट में आमतौर पर दर्द नहीं होता। बच्चा बहुत छोटा हो या जवाब ना दे पाए, तब भी कुछ टेस्ट किए जा सकते हैं। डॉक्टर उसकी उम्र, लक्षणों और विकास के अनुसार सही टेस्ट चुनते हैं।

बच्चों की कानों की जाँच में ये तरीके शामिल हो सकते हैं:

  • सामान्य जाँच: बच्चों के लिए ईएनटी डॉक्टर एक विशेष उपकरण से कान की नली और पर्दे को देखते हैं। इससे मैल, सूजन, संक्रमण, चोट या फ़्लूइड जैसी समस्याओं का पता लगाया जा सकता है।
  • ओटोअकूस्टिक एमिशन टेस्ट: कान में एक छोटा और मुलायम उपकरण रखा जाता है। ये हल्की आवाज़ें भेजकर देखता है कि अंदरूनी कान उनके प्रति कैसी प्रतिक्रिया देता है।
  • ऑडिटरी ब्रेनस्टेम रिस्पॉन्स टेस्ट: बच्चे के सिर पर छोटे सेंसर लगाए जाते हैं। ये आवाज़ सुनने पर नस और दिमाग़ में होने वाली प्रतिक्रिया को रिकॉर्ड करते हैं। छोटा बच्चा टेस्ट के समय सो सकता है।
  • टिम्पैनोमेट्री: ये टेस्ट बताता है कि कान का पर्दा ठीक तरह से हिल रहा है या नहीं। इससे मिडिल ईयर में फ़्लूइड या दबाव की समस्या का पता चल सकता है।
  • ऑडियोमेट्री: उम्र के अनुसार बच्चे को आवाज़ सुनकर हाथ उठाने, बटन दबाने, तस्वीर चुनने या किसी खिलौने से काम करने के लिए कहा जाता है। इससे पता चलता है कि वह अलग-अलग स्तर की आवाज़ें कितनी अच्छी तरह सुन पाता है।

सुनने की समस्या का बोलने और सीखने पर प्रभाव

बच्चे रोज़ की बातचीत सुनकर भाषा सीखते हैं। जब कोई शब्द बार-बार साफ़ सुनाई देता है, तभी बच्चा उसका अर्थ समझकर उसे बोलना सीखता है। सुनने में कमी होने पर शब्द सीखने, वाक्य बनाने, सही उच्चारण करने और निर्देश समझने में देरी हो सकती है।

कक्षा में शिक्षक की आवाज़ साफ़ ना सुनाई देने पर बच्चा पढ़ाई में पीछे रह सकता है। उसे दूसरे बच्चों से बातचीत करने में भी परेशानी हो सकती है। इसका असर आत्मविश्वास और व्यवहार पर पड़ सकता है।

बच्चों में सुनने की समस्या का इलाज

इलाज समस्या के कारण, उसके स्तर और बच्चे की उम्र के अनुसार तय होता है।

इलाज में इन तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है:

  • मैल या संक्रमण की देखभाल: बच्चों के कान के डॉक्टर सुरक्षित तरीके से कान का मैल निकाल सकते हैं। संक्रमण या फ़्लूइड होने पर कारण के अनुसार दवा, निगरानी या दूसरी प्रक्रिया की सलाह दी जा सकती है।
  • नियमित निगरानी: कुछ बच्चों में फ़्लूइड या हल्की समस्या समय के साथ ठीक हो सकती है। इस दौरान दोबारा जाँच करके देखा जाता है कि सुनने की क्षमता में सुधार हो रहा है या नहीं।
  • हियरिंग एड: ये उपकरण आवाज़ को बच्चे की ज़रूरत के अनुसार तेज़ और साफ़ करता है। इसे सही तरह से सेट करने और नियमित रूप से जाँचने की आवश्यकता होती है।
  • कॉक्लियर इम्प्लांट: सुनने की समस्या गंभीर हो और हियरिंग एड से ज़्यादा लाभ ना मिले, तो विशेषज्ञ जाँच कर सकते हैं कि कॉक्लियर इम्प्लांट बच्चे के लिए सही रहेगा या नहीं। इम्प्लांट के बाद भी नियमित सेटिंग, सुनने की ट्रेनिंग और स्पीच थेरेपी ज़रूरी होती है।

बच्चे को ईएनटी विशेषज्ञ के पास कब ले जाएँ?

बच्चे के सुनने, बोलने या व्यवहार में बदलाव दिखे, तो बाल ईएनटी विशेषज्ञ से सलाह लें। बार-बार कान में संक्रमण, दर्द, फ़्लूइड या स्कूल में सुनने की परेशानी होने पर भी जाँच करवानी चाहिए।

अचानक सुनाई देना कम हो जाए, कान या सिर पर चोट लगे, कान से ख़ून या पस निकले अथवा कोई वस्तु कान में फँस जाए, तो जल्दी चिकित्सा सहायता लें। कान के अंदर फँसी वस्तु को घर पर निकालने की कोशिश ना करें, क्योंकि इससे वह और अंदर जा सकती है।

निष्कर्ष

बच्चों में सुनने की क्षमता कम होना हमेशा तुरंत पहचान में नहीं आता। नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया ना देना, बोलने में देरी, बार-बार बात दोहराने को कहना या टीवी की आवाज़ बढ़ाना इसके संकेत हो सकते हैं। ऐसे बदलावों को केवल लापरवाही या कम ध्यान देने की आदत ना समझें।

सर्वोदय हॉस्पिटल, फ़रीदाबाद का सर्वश्रेष्ठ ईएनटी विशेषज्ञ अस्पताल, में बच्चों के कानों और सुनने से जुड़ी समस्याओं की जाँच तथा इलाज की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। ईएनटी विशेषज्ञ डॉक्टर बच्चे के लक्षण, उम्र और हियरिंग टेस्ट के परिणाम के आधार पर उचित देखभाल तय कर सकते हैं।

बच्चे में सुनने से जुड़ा कोई संकेत दिखाई दे, तो सही जाँच और इलाज के लिए आज ही सर्वोदय हॉस्पिटल में ईएनटी डॉक्टर से परामर्श लें।

FAQs

तेज़ आवाज़ पर ना चौंकना, आवाज़ की ओर सिर ना घुमाना, नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया ना देना, बोलने में देरी और टीवी की आवाज़ अधिक रखना शुरुआती संकेत हो सकते हैं।

बच्चा कुछ आवाज़ों को अनसुना कर सकता है, बार-बार बात दोहराने को कह सकता है या सामने वाले का चेहरा देखकर बात समझने की कोशिश कर सकता है। हियरिंग टेस्ट से परेशानी के कारण पता चलता है।

जेनेटिक कारण, गर्भावस्था या जन्म से जुड़ी स्थितियाँ, कान का संक्रमण, फ़्लूइड, मैल, तेज़ शोर, गंभीर बीमारी और चोट इसके कारण हो सकते हैं।

नवजात की हियरिंग स्क्रीनिंग जन्म के बाद करानी चाहिए। इसके अलावा, किसी भी उम्र में सुनने, बोलने या निर्देश समझने से जुड़े संकेत दिखाई दें, तो जाँच करवाएँ।

हाँ। नवजात की हियरिंग स्क्रीनिंग से जन्म से मौजूद सुनने की समस्या का जल्दी पता लगाने में मदद मिलती है। इससे आवश्यक सहायता समय पर शुरू की जा सकती है।

आवाज़ और शब्द साफ़ ना सुन पाने पर बच्चे को भाषा सीखने, सही उच्चारण करने, बोलने और निर्देश समझने में देरी हो सकती है। इसका असर पढ़ाई और बातचीत पर भी पड़ सकता है।

बच्चे की उम्र के अनुसार ओटोअकूस्टिक एमिशन, ऑडिटरी ब्रेनस्टेम रिस्पॉन्स, टिम्पैनोमेट्री या ऑडियोमेट्री जैसे टेस्ट किए जा सकते हैं। इन टेस्ट के दौरान आमतौर पर बच्चे को दर्द नहीं होता।

इलाज में मैल या संक्रमण की देखभाल, नियमित निगरानी, हियरिंग एड, स्पीच और लैंग्वेज थेरेपी, सहायक उपकरण या ज़रूरत के अनुसार सर्जरी शामिल हो सकती है।

सुनने में बदलाव, बोलने में देरी, बार-बार कान का संक्रमण, स्कूल में सुनने की परेशानी या हियरिंग स्क्रीनिंग में समस्या मिलने पर बच्चे को विशेषज्ञ के पास ले जाएँ।

जब गंभीर सुनने की समस्या में सही तरह से लगाए गए हियरिंग एड से पर्याप्त लाभ ना मिले, तब विशेषज्ञ कॉक्लियर इम्प्लांट पर विचार कर सकते हैं। इसका फैसला बच्चों के ईएनटी अस्पताल में पूरी जाँच के बाद किया जाता है।

Dr. Ayush Chawla | ENT & Cochlear Implant | Sarvodaya Hospital

Dr. Ayush Chawla
Consultant - ENT

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